अध्याय 100 - द गार्ड्स

कोबान का नज़रिया

मार्गोट दो गिलास पानी लेकर लौटी, जैसे काँच के बम उठा रखे हों। उसकी उंगलियाँ इतनी हल्की काँप रही थीं कि मैं पानी की सतह तक थरथराते देख पा रहा था।

वह मेरी तरफ देखी भी नहीं, बस आकर मेरे बगल में अपनी जगह पर बैठ गई और इंतज़ार करने लगी।

हमेशा अगली चीज़ का इंतज़ार करती रहती है…

मैं...

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