अध्याय 218 - परिवर्तन

मार्गो की नज़र से

“आज तो शनिवार भी नहीं है… तो अगर इन्होंने हमें बसों में ठूँसकर यहाँ इतनी जल्दी पहुँचा दिया है, तो ज़रूर कुछ बहुत गड़बड़ है।” कारा की आवाज़ उस बेचैन ख़ामोशी को चीरती हुई निकली, जब हमें झुंड की तरह आगे हाँका जा रहा था।

हम सब एक ही उलझी हुई लहर की तरह, भीड़ में मिले-जुले, उस बड़...

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