अध्याय 13

इंग्रिड को बार‑बार लगता कि उसकी सत्ता को चुनौती दी जा रही है, और ग़ुस्से से उसका बदन तक काँप उठता।

इंग्रिड की आँखों में भरी घृणा—जो भौहों के कोनों तक खिंची हुई थी—देखकर कैटनिस अब वह नाटक आगे नहीं निभाना चाहती थी: आज्ञाकारी, सती‑साध्वी, संस्कारी बहू वाला अभिनय।

इंग्रिड उसे नीची नज़र से ही देखती, चा...

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