अध्याय 44

रात और गहरी हो गई।

अधखुले परदों के बीच से चाँदनी छलककर भीतर आई और शांत अस्पताल के कमरे पर चाँदी-सी रोशनी बिखेर गई। दरवाज़ा खुलने की हल्की-सी टिक-टिक खामोशी में यूँ फैल गई जैसे ठहरे पानी में कंकड़ गिर जाए—और फिर कुछ ही पलों बाद सब फिर से शांत हो गया।

कैट्निस करवट लेकर सो रही थी, साँसें बराबर चल रही...

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