अध्याय 93

होटल में।

कमरे में कब्र-सी ख़ामोशी थी।

कतनीस न जाने कब से छत को घूरे जा रही थी—उसी एक हालत में जड़ बनी हुई—कि तभी फोन की अचानक हुई घंटी ने उसे जैसे झकझोरकर हक़ीक़त में वापस खींच लिया।

वह पलकें झपकाकर हड़बड़ाई, कुछ सेकंड लगे समझने में, फिर जेब में हाथ डालकर लड़खड़ाते हुए फोन टटोलने लगी।

उसने स्क्...

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