अध्याय 117

समर की दृष्टि से

ट्रेन पेन स्टेशन से धीरे-धीरे निकल रही थी, हल्के-हल्के डोलती हुई, और मैंने अपना माथा ठंडी खिड़की से टिकाकर बाहर देखा, जहाँ शहर की रोशनियाँ धुंधली होकर सुनहरी और सफ़ेद लकीरों में बदलती जा रही थीं। शीशे में मेरी अपनी परछाईं मुझे घूर रही थी—धँसी हुई आँखें, ज़रूरत से ज़्यादा दुबला शरीर...

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